UPMSP द्वारा जारी आधिकारिक मॉडल पेपर (सत्र 2026-27) के अनुसार, यूपी बोर्ड कक्षा 12वीं भौतिक विज्ञान (Physics) के परीक्षा पैटर्न, 70 अंकों के विस्तृत अंक विभाजन और 5 अलग-अलग खण्डों की संरचना को इस पोस्ट में विस्तार से समझाया गया है। यदि आप मुख्य बोर्ड परीक्षा में अधिकतम अंक प्राप्त करना चाहते हैं, तो जानें कि बहुविकल्पीय, अति लघु, लघु तथा विस्तृत उत्तरीय प्रश्नों का वितरण किस प्रकार रहेगा और पूरे पेपर को निर्धारित समय में कैसे हल करें।
यूपी बोर्ड 12वीं भौतिक विज्ञान मॉडल पेपर 2027 (हल सहित PDF)
खण्ड ‘अ’ (Section A) – बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
विस्तृत हल (Detailed Solution):
पृष्ठ ‘S’ का क्षेत्रफल 4L² (अर्थात 2L × 2L) है। यदि हम इस घनाभ के पृष्ठ ‘S’ के दूसरी ओर ठीक वैसा ही दूसरा घनाभ रख दें, तो आवेश q एक सममित घन (Cube) के केंद्र पर आ जाएगा जिसकी प्रत्येक भुजा 2L होगी।
- घन में कुल 6 समान वर्गाकार फलक (Faces) होते हैं, जिनमें से प्रत्येक का क्षेत्रफल 2L × 2L = 4L² है।
- सममिति (Symmetry) के कारण, प्रत्येक फलक से बराबर फ्लक्स गुजरेगा।
- पृष्ठ ‘S’ का विपरीत पृष्ठ भी घन का एक फलक है।
अतः विपरीत पृष्ठ से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स = Φ / 6 = q / (6 ε₀)
विस्तृत हल (Detailed Solution):
वैद्युत चालकता (σ) किसी पदार्थ का विशिष्ट गुण है जो निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होती है:
- तापमान (Temperature): ताप बढ़ने पर शिथिलन काल (Relaxation time) घटता है, जिससे चालकता बदलती है।
- शुद्धता (Purity): अपद्रव्य मिलाने से चालक के मुक्त इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह में बाधा आती है।
- दाब (Pressure): यांत्रिक तनाव या दाब से जालक (Lattice) संरचना प्रभावित होती है।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
निर्वात में प्रकाश की चाल (Speed of light) ‘c’ का सूत्र होता है:
- चाल (c) का विमीय सूत्र = [L T⁻¹]
- c² का विमीय सूत्र = [L T⁻¹]² = [L² T⁻²]
अतः 1 / (μ₀ × ε₀) का विमीय सूत्र वही होगा जो वेग के वर्ग (c²) का होता है।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
दिया है (Given):
- शिखर वोल्टता (V₀) = 30 V
- शिखर धारा (I₀) = 0.3 A
- कलान्तर (Phase difference, ϕ) = 60°
गणना (Calculation):
Pavg = (30 × 0.3 / 2) × cos(60°)
Pavg = 4.5 × (1 / 2) = 2.25 वाट (W)
विस्तृत हल (Detailed Solution):
एकल झिरी द्वारा विवर्तन (Diffraction at single slit) में निम्निष्ठ (Minimum) प्राप्त होने की शर्त है:
प्रथम निम्निष्ठ (n = 1) के लिए: e × sin(θ) = λ
चूँकि विवर्तन कोण θ अत्यंत सूक्ष्म होता है, अतः sin(θ) ≈ θ।
इसलिए, कोणीय स्थिति θ = λ / e प्राप्त होती है। यही मुख्य उच्चिष्ठ के केंद्र से प्रथम निम्निष्ठ की कोणीय दूरी है।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
p-टाइप अर्धचालक बनाने के लिए निज/शुद्ध अर्धचालक में त्रि-संयोजी (Trivalent) अपद्रव्य परमाणु मिलाए जाते हैं।
- ऐलुमिनियम (Al): त्रि-संयोजी (Trivalent) तत्व है, जो कोटर (Hole) उत्पन्न करता है।
- फ़ॉस्फ़ोरस, आर्सेनिक, ऐन्टिमनी: पंच-संयोजी (Pentavalent) तत्व हैं, जिनका प्रयोग n-टाइप अर्धचालक बनाने में होता है।
खण्ड ‘ब’ एवं खण्ड ‘स’ (Section B & Section C) – अति लघु एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1. मात्रक (Unit):
निर्वात की चुंबकीयशीलता (Permeability of free space) का एस.आई. (S.I.) मात्रक न्यूटन / एम्पीयर² (N/A²) अथवा हेनरी / मीटर (H/m) होता है।
2. विमीय सूत्र (Dimensional Formula):
दो समांतर धारावाही चालकों के बीच प्रति एकांक लंबाई पर लगने वाले बल के सूत्र से:
विमाओं को प्रतिस्थापित करने पर:
- बल (F) की विमा = [M L T⁻²]
- दूरी (r, L) की विमा = [L]
- धारा (I₁, I₂) की विमा = [A]
- μ₀ की विमा = [M L T⁻²] × [L] / ([A]² × [L]) = [M L T⁻² A⁻²]
उत्तर:
फैराडे के वैद्युतचुंबकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) नियम तथा ओम के नियम से, प्रेरित धारा i = e / R = (N / R) × (dΦ / dt) होती है। अतः प्रेरित विद्युत धारा निम्नलिखित तीन प्रमुख कारकों पर निर्भर करती है:
- चुंबकीय फ्लक्स परिवर्तन की दर (Rate of change of magnetic flux, dΦ / dt): फ्लक्स परिवर्तन जितना तीव्र होगा, प्रेरित धारा उतनी ही अधिक होगी।
- कुंडली में फेरों की संख्या (Number of turns, N): फेरों की संख्या बढ़ने पर प्रेरित विद्युत वाहक बल एवं धारा का मान बढ़ता है।
- परिपथ का कुल प्रतिरोध (Total Resistance of circuit, R): परिपथ का प्रतिरोध जितना कम होगा, प्रेरित धारा का मान उतना ही अधिक होगा।
उत्तर:
- सबसे बड़ी तरंगदैर्ध्य (Longest Wavelength): रेडियो तरंगें (Radio Waves) — इनकी तरंगदैर्ध्य 10⁻¹ मीटर से 10⁴ मीटर तक होती है।
- सबसे छोटी तरंगदैर्ध्य (Shortest Wavelength): गामा किरणें (Gamma Rays) — इनकी तरंगदैर्ध्य 10⁻¹⁴ मीटर से 10⁻¹⁰ मीटर तक होती है।
दिया है (Given): प्रिज्म कोण = A, न्यूनतम विचलन कोण (δm) = A
हल (Solution):
- δm = A रखने पर: n = sin[(A + A) / 2] / sin(A / 2)
- n = sin(2A / 2) / sin(A / 2) = sin(A) / sin(A / 2)
- त्रिकोणमितीय सूत्र sin(A) = 2 sin(A/2) cos(A/2) का प्रयोग करने पर:
- n = [2 sin(A/2) cos(A/2)] / sin(A/2)
- n = 2 cos(A / 2)
अतः प्रिज्म के पदार्थ का अपवर्तनांक 2 cos(A/2) होगा।
हल (Solution):
बामर श्रेणी के लिए निम्नतम ऊर्जा स्तर n₁ = 2 होता है। बामर श्रेणी की द्वितीय रेखा (Hβ रेखा) के लिए उच्चतम ऊर्जा स्तर n₂ = 4 होता है।
- 1 / λ = R × [ (1 / 2²) – (1 / 4²) ]
- 1 / λ = R × [ (1 / 4) – (1 / 16) ]
- 1 / λ = R × [ (4 – 1) / 16 ] = 3R / 16
- λ = 16 / (3R)
अतः बामर श्रेणी की द्वितीय रेखा की तरंगदैर्ध्य 16 / (3R) होगी।
परिभाषा (Definition):
जब उच्च ऊर्जा वाला कोई गामा-फ़ोटॉन (γ-photon, ऊर्जा ≥ 1.02 MeV) किसी भारी पदार्थ के नाभिक पर आपतित होता है, तो वह नाभिक द्वारा अवशोषित होकर एक इलेक्ट्रॉन (e⁻) तथा एक पॉज़िट्रॉन (e⁺) के युग्म में रूपांतरित हो जाता है। इस घटना को युग्म उत्पादन (Pair Production) कहते हैं।
यह घटना आइंस्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता सिद्धांत (E = mc²) का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
उपपत्ति (Derivation):
माना किसी C धारिता वाले अनावेशित चालक को q आवेश देने पर उसका विभव 0 से बढ़कर V हो जाता है।
- प्रारंभ में चालक का विभव = 0
- q आवेश देने पर अंतिम विभव = V
- चालक का औसत विभव (Average Potential) = (0 + V) / 2 = V / 2
चालक को सूक्ष्म आवेश dq देने में किया गया सूक्ष्म कार्य dW = V’ dq होता है। कुल कार्य (W):
चूँकि चालक का आवेश q = C V होता है, अतः q का मान रखने पर:
W = ½ × (C V) × V = ½ C V²
यह किया गया कार्य ही चालक में वैद्युत स्थितिज ऊर्जा (Electrostatic Potential Energy, U) के रूप में संचित होता है:
इति सिद्धम् (Hence Proved)।
कथन (Statement):
किसी बंद समतल वक्र (Closed Loop) के अनुदिश चुंबकीय क्षेत्र B का रेखीय समाकलन (Line Integral), उस बंद वक्र द्वारा परिबद्ध (घिरे) क्षेत्रफल से होकर प्रवाहित होने वाली कुल धारा I का μ₀ गुना होता है।
व्युत्पत्ति (Derivation):
माना एक अनन्त लंबाई के सीधे धारावाही तार में I धारा प्रवाहित हो रही है। तार से r दूरी पर वृत्तीय पथ की कल्पना करते हैं।
- बायो-सेवर्ट के नियम से, r दूरी पर चुंबकीय क्षेत्र B = (μ₀ I) / (2π r)
- प्रत्येक बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र B और अल्पांश dl की दिशा समान (θ = 0°) होती है।
- रेखीय समाकलन: ∫ B · dl = ∫ B dl cos(0°) = B ∫ dl
- चूँकि ∫ dl = वृत्त की परिधि = 2π r:
- ∫ B · dl = [ (μ₀ I) / (2π r) ] × (2π r) = μ₀ I
इति सिद्धम् (Hence Proved)।
दिया है (Given):
- स्वप्रेरकत्व (L) = 10 mH = 10 × 10⁻³ H
- समय अंतराल (Δt) = 5 ms = 5 × 10⁻³ s
- धारा में परिवर्तन (ΔI) = I₂ – I₁ = 15 A – 5 A = 10 A
हल (Solution):
|e| = (10 × 10⁻³ H) × [ 10 A / (5 × 10⁻³ s) ]
|e| = 10 × (10 / 5) = 10 × 2 = 20 वोल्ट (V)
अतः कुंडली में उत्पन्न प्रेरित विद्युत वाहक बल का परिमाण 20 V होगा।
परिणामी परिपथ विश्लेषण (Circuit Analysis):
- ऊपरी शाखा (Diode D₁): डायोड D₁ अग्र अभिनत (Forward Biased) है। अतः यह चालन करेगा। इस शाखा का प्रतिरोध R₁ = Rdiode + Rext = 50 Ω + 200 Ω = 250 Ω।
- मध्य शाखा (Diode D₂): डायोड D₂ उत्क्रम अभिनत (Reverse Biased) है। अतः इसका प्रतिरोध अनंत माना जाएगा और इस शाखा से शून्य धारा प्रवाहित होगी।
- मुख्य श्रेणी प्रतिरोध: परिपथ में नीचे श्रेणी में R₃ = 25 Ω जुड़ा है। सेल की वोल्टता V = 6 V है।
धारा की गणना (Calculation of Current):
सेल से प्रवाहित कुल धारा I = V / Rtotal
I = 6 / 275 A = 0.0218 एम्पीयर (A) ≈ 21.8 मिली-एम्पीयर (mA)
खण्ड ‘द’ (Section D) – लघु उत्तरीय प्रश्न – II
1. अनुगमन वेग की परिभाषा (Definition of Drift Velocity):
जब किसी चालक के सिरों के बीच विभवांतर लगाया जाता है, तो चालक के भीतर उपस्थित मुक्त इलेक्ट्रॉन एक नियत सूक्ष्म औसत वेग (~10⁻⁴ m/s) से उच्च विभव वाले सिरे की ओर खिसकने (Set drift) लगते हैं। इस औसत वेग को अनुगमन वेग या अपवाह वेग (Drift Velocity, vd) कहते हैं।
2. धारा तथा अनुगमन वेग में संबंध (Relation between Current and Drift Velocity):
माना L लंबाई तथा A अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल वाले चालक में मुक्त इलेक्ट्रॉन घनत्व (प्रति एकांक आयतन इलेक्ट्रॉनों की संख्या) ‘n’ है।
- चालक का कुल आयतन = A × L
- चालक में उपस्थित कुल मुक्त इलेक्ट्रॉन = n × A × L
- चालक का कुल मुक्त आवेश (q) = n A L e (जहाँ e = इलेक्ट्रॉन का आवेश)
- इलेक्ट्रॉनों द्वारा L लंबाई पार करने में लगा समय (t) = L / vd
ओम के नियम एवं धारा की परिभाषा से प्रवाहित धारा (I):
जहाँ I = धारा (एम्पीयर), n = इलेक्ट्रॉन घनत्व, e = इलेक्ट्रॉन का आवेश, A = क्षेत्रफल, vd = अनुगमन वेग।
1. अनुनाद की स्थिति (Resonance Condition):
श्रेणीक्रम L-C-R परिपथ में जब प्रेरकत्व प्रतिघात (Prerakiy Pratighat, XL) तथा धारितीय प्रतिघात (Dharitiya Pratighat, XC) का मान आपस में बराबर हो जाता है, तो परिपथ की प्रतिबाधा (Impedance, Z) न्यूनतम (Z = R) हो जाती है। इस स्थिति को वैद्युत अनुनाद (Electrical Resonance) कहते हैं।
2. अनुनादी आवृत्ति का सूत्र (Resonant Frequency Derivation):
- ω² = 1 / (L C)
- कौणीय आवृत्ति ω = 1 / √(L C)
- चूँकि ω = 2π fr होती है, अतः अनुनादी आवृत्ति (fr):
3. प्रतिरोध (R) पर निर्भरता:
अनुनादी आवृत्ति का सूत्र स्पष्ट करता है कि fr केवल प्रेरकत्व (L) एवं धारिता (C) पर निर्भर करती है। यह प्रतिरोध (R) के मान पर बिल्कुल निर्भर नहीं करती। प्रतिरोध केवल अनुनाद के समय अधिकतम धारा के परिमाण को नियंत्रित करता है।
उपपत्ति (Derivation):
माना प्रिज्म कोण A तथा आपतन कोण i एवं अपवर्तन कोण r है। प्रिज्म के लिए कुल विचलन कोण δ = (i₁ + i₂) – (r₁ + r₂) होता है।
- प्रिज्म के भीतर ज्योमितीय संबंध से: r₁ + r₂ = A
- अतः विचलन कोण: δ = i₁ + i₂ – A
- अल्पतम (न्यूनतम) विचलन की स्थिति में: δ = δm, i₁ = i₂ = i, तथा r₁ = r₂ = r
अल्पतम विचलन स्थिति के समीकरणों से:
- 2r = A ⇒ r = A / 2
- δm = 2i – A ⇒ i = (A + δm) / 2
स्नेल के नियम (Snell’s Law) से अपवर्तनांक (n):
इति सिद्धम् (Hence Proved)।
1. फोटॉन का विराम एवं गतिक द्रव्यमान:
- विराम द्रव्यमान (Rest Mass): फोटॉन का विराम द्रव्यमान शून्य (Zero) होता है क्योंकि फोटॉन कभी भी विराम अवस्था में नहीं रह सकता; यह सदैव प्रकाश की चाल (c) से गतिमान रहता है।
- गतिक द्रव्यमान (Kinetic Mass): आइंस्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा समीकरण (E = m c²) तथा प्लांक सूत्र (E = hν) की तुलना करने पर: m c² = hν ⇒ m = hν / c² = h / (c λ)।
2. फोटॉन के संवेग का निगमन (Derivation of Momentum):
फोटॉन का संवेग (p) = गतिक द्रव्यमान (m) × चाल (c)
चूँकि प्रकाश की आवृत्ति एवं तरंगदैर्ध्य का संबंध c = ν λ (अर्थात ν/c = 1/λ) होता है:
जहाँ h = प्लांक नियतांक तथा λ = फोटॉन की तरंगदैर्ध्य। इति सिद्धम्।
तुलना (Comparison):
दिए गए समीकरण Ey = 30 sin(2 × 10¹¹ t + 300 π x) की तुलना मानक मानक समीकरण Ey = E₀ sin(ωt + kx) से करने पर:
- वैद्युत क्षेत्र का आयाम (E₀) = 30 V/m
- कोणीय आवृत्ति (ω) = 2 × 10¹¹ rad/s
- संचलनांक नियतांक (k) = 300 π rad/m
(i) तरंगदैर्ध्य की गणना (Wavelength):
(ii) दोलित चुंबकीय क्षेत्र का व्यंजक (Magnetic Field Expression):
- चुंबकीय क्षेत्र का आयाम (B₀) = E₀ / c = 30 / (3 × 10⁸) = 10⁻⁷ टेसला (T)
- समीकरण में ‘+kx’ पद यह दर्शाता है कि तरंग ऋणात्मक X-अक्ष (-x direction) के अनुदिश गमन कर रही है।
- वैद्युत क्षेत्र Y-अक्ष के अनुदिश है। अतः चुंबकीय क्षेत्र Z-अक्ष (z-axis) के अनुदिश होगा।
1. सेल का आंतरिक प्रतिरोध (Internal Resistance):
जब किसी सेल की प्लेटों को तार द्वारा जोड़ा जाता है, तो सेल के भीतर उसके विद्युत अपघट्य (Electrolyte) का घोल धारा के प्रवाह में जो रुकावट डालता है, उसे सेल का आंतरिक प्रतिरोध (r) कहते हैं。
2. परिपथ आंकिक हल (Numerical Solution):
चित्र अनुसार घटक (Components): E₁ = 10 V (r₁ = 2 Ω), E₂ = 2 V (r₂ = 1 Ω), R₁ = 3 Ω, R₂ = 2 Ω।
- दोनों सेलों के धनात्मक ध्रुव विपरीत जुड़े हैं, अतः प्रभावी e.m.f. (Enet) = E₁ – E₂ = 10 – 2 = 8 V
- परिपथ का कुल प्रतिरोध (Rnet) = r₁ + r₂ + R₁ + R₂ = 2 + 1 + 3 + 2 = 8 Ω
- परिपथ में प्रवाहित मुख्य धारा I = Enet / Rnet = 8 V / 8 Ω = 1 एम्पीयर (A)
सेल के सिरों का विभवांतर (Terminal Voltage):
- सेल 1 (10 V – डिस्चार्ज हो रहा है): V₁ = E₁ – I r₁ = 10 – (1 × 2) = 8 वोल्ट (V)
- सेल 2 (2 V – चार्ज हो रहा है): V₂ = E₂ + I r₂ = 2 + (1 × 1) = 3 वोल्ट (V)
1. संरचना एवं प्रतिबिंब का बनना (Working & Ray Diagram Description):
खगोलीय दूरदर्शी में दो उत्तल लेंस होते हैं — अभिदृश्यक (Objective Lens, Lo) तथा नेत्रिका (Eyepiece, Le)।
- अनंत पर स्थित वस्तु से आने वाली समांतर किरणें अभिदृश्यक द्वारा उसके मुख्य फोकस Fo पर एक वास्तविक, उल्टा तथा छोटा प्रतिबिंब A’B’ बनाती हैं।
- यह प्रतिबिंब A’B’ नेत्रिका के लिए आभासी वस्तु का कार्य करता है।
- नेत्रिका को इस प्रकार समायोजित किया जाता है कि A’B’ इसके फोकस Fe तथा प्रकाशिक केंद्र के बीच आ जाए, जिससे अंतिम प्रतिबिंब A”B” स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी (D = 25 cm) पर बड़ा, आभासी और उल्टा बनता है।
2. आवर्धन क्षमता का सूत्र (Magnification Formula):
दूरदर्शी की कुल नली की लंबाई L = fo + ue होती है।
दिया है (Given): λ = 1.98 × 10⁻⁷ m, संस्तब्ध (निरोधी) विभव V₀ = 2.5 V
1. अधिकतम गतिज ऊर्जा (Maximum Kinetic Energy, Kmax):
2. आपतित फोटॉन की ऊर्जा (Photon Energy, E):
E = (h × c) / λ = (6.63 × 10⁻³⁴ × 3 × 10⁸) / (1.98 × 10⁻⁷)
E = (1.989 × 10⁻²⁵) / (1.98 × 10⁻⁷) = 1.0045 × 10⁻¹⁸ J ≈ 6.28 eV
3. कार्यफलन की गणना (Work Function, W):
आइंस्टीन के प्रकाश वैद्युत समीकरण E = W + Kmax से:
नील्स बोहर की तीन मुख्य परिकल्पनाएँ:
- 1. स्थायी कक्षा की अवधारणा (Stationary Orbits): इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर केवल उन्हीं निश्चित अवीकिरण कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं जिनमें उनका कोणीय संवेग (Angular Momentum, L) h/2π का पूर्ण गुणज होता है।
L = m v r = (n h) / (2π) [जहाँ n = 1, 2, 3…]
- 2. अभिकेंद्र बल (Centripetal Force): इलेक्ट्रॉन को वृत्ताकार कक्षा में घूमने के लिए आवश्यक अभिकेंद्र बल, नाभिक (प्रोटॉन) तथा इलेक्ट्रॉन के बीच लगने वाले स्थिरवैद्युत आकर्षण बल (Coulomb Force) से प्राप्त होता है।
(m v² / r) = [ 1 / (4π ε₀) ] × (e² / r²)
- 3. आवृत्ति नियम (Frequency Condition): स्थायी कक्षा में घूमते समय इलेक्ट्रॉन ऊर्जा का उत्सर्जन नहीं करता। जब इलेक्ट्रॉन उच्च कक्षा (E₂) से निम्न कक्षा (E₁) में कूदता है, तो ऊर्जा का उत्सर्जन फोटॉन के रूप में होता है।
E₂ – E₁ = h ν
घटकों का विश्लेषण: ₆¹²C नाभिक में 6 प्रोटॉन तथा (12 – 6) = 6 न्यूट्रॉन हैं। कुल न्यूक्लियॉन = 12।
- 6 प्रोटॉनों का द्रव्यमान = 6 × 1.0081 amu = 6.0486 amu
- 6 न्यूट्रॉनों का द्रव्यमान = 6 × 1.0090 amu = 6.0540 amu
- न्यूक्लियॉनों का कुल द्रव्यमान = 6.0486 + 6.0540 = 12.1026 amu
- दिया गया नाभिक का द्रव्यमान = 12.0038 amu
द्रव्यमान क्षति (Mass Defect, Δm):
Δm = 12.1026 – 12.0038 = 0.0988 amu
कुल बंधन ऊर्जा (Total Binding Energy):
E = Δm × 931.5 MeV = 0.0988 × 931.5 MeV = 92.0322 MeV
प्रति न्यूक्लियॉन बंधन ऊर्जा (Binding Energy per Nucleon):
खण्ड ‘य’ (Section E) – दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. गॉस की प्रमेय का कथन (Statement):
किसी बंद पृष्ठ (Closed Surface) से होकर गुजरने वाला कुल वैद्युत फ्लक्स (Electrostatic Flux, ΦE), उस पृष्ठ द्वारा परिबद्ध (Enclosed) कुल परिद्ध आवेश (Q) का 1/ε₀ गुना होता है।
2. उपपत्ति (Proof of Gauss’s Law):
माना O बिंदु पर एक बिंदु आवेश +q रखा है तथा r त्रिज्या के एक गोले का गॉसियन पृष्ठ खींचते हैं।
- गोलीय पृष्ठ पर बिंदु P पर वैद्युत क्षेत्र की तीव्रता: E = [ 1 / (4π ε₀) ] × (q / r²)
- अल्पांश क्षेत्रफल dA से गुजरने वाला फ्लक्स: dΦE = E · dA = E dA cos(0°) = E dA
- सम्पूर्ण गोले के पृष्ठ से गुजरने वाला कुल फ्लक्स: ΦE = ∫ E dA = E ∫ dA
- चूँकि गोले का कुल पृष्ठ क्षेत्रफल ∫ dA = 4π r² होता है:
- ΦE = [ 1 / (4π ε₀) × (q / r²) ] × (4π r²) = q / ε₀ (इति सिद्धम्)
3. अनन्त लम्बाई के आवेशित तार के कारण वैद्युत क्षेत्र (Application):
माना तार का रेखीय आवेश घनत्व (Linear Charge Density) λ है। r दूरी पर l लम्बाई का बेलनाकार गॉसियन पृष्ठ (Cylindrical Gaussian Surface) लेते हैं।
- बेलनाकार पृष्ठ के दोनों समतल वृत्तीय सिरों पर E और dA लंबवत (θ = 90°) हैं, अतः इनसे गुजरने वाला फ्लक्स शून्य होगा।
- वक्र पृष्ठ (Curved Surface) पर E और dA की दिशा समान (θ = 0°) है।
- वक्र पृष्ठ से गुजरने वाला कुल फ्लक्स ΦE = E × (2π r l)
- गॉस की प्रमेय से: ΦE = Q / ε₀ = (λ l) / ε₀ (चूँकि Q = λ l)
- E × (2π r l) = (λ l) / ε₀
उपपत्ति (Derivation):
माना संधारित्र की पट्टियों का क्षेत्रफल A तथा उनके बीच की दूरी d है। पट्टियों पर आवेश +q एवं -q है (पृष्ठ आवेश घनत्व σ = q / A)। पट्टियों के बीच t मोटाई की K परावैद्युतांक वाली पट्टी रखी है।
- पट्टियों के बीच निर्वात/वायु की मोटाई = (d – t)
- परावैद्युत माध्यम की मोटाई = t
- वायु में वैद्युत क्षेत्र: E₀ = σ / ε₀ = q / (A ε₀)
- परावैद्युत पट्टी में वैद्युत क्षेत्र: E = σ / (K ε₀) = q / (K A ε₀)
पट्टियों के बीच कुल विभवांतर (V):
सामान्य पद q / (A ε₀) उभयनिष्ठ (Common) लेने पर:
V = [ q / (A ε₀) ] × [ (d – t) + (t / K) ]
धारिता की परिभाषा C = q / V से:
विशेष स्थितियाँ (Special Cases):
- यदि पट्टी पूरी दूरी में भरी हो (t = d): C = K A ε₀ / d
- यदि धातु की पट्टी रखी हो (K = ∞): C = A ε₀ / (d – t)
1. बल के व्यंजक का निगमन (Derivation):
माना दो सीधे समांतर चालक तार A व B परस्पर r दूरी पर निर्वात में रखे हैं, जिनमें क्रमशः I₁ तथा I₂ धाराएँ बह रही हैं।
- चालक A में बहती धारा I₁ के कारण चालक B के किसी बिंदु पर चुंबकीय क्षेत्र: B₁ = (μ₀ I₁) / (2π r)
- चुंबकीय क्षेत्र B₁ में स्थित चालक B की L लंबाई पर लगने वाला लॉरेंज बल: F = I₂ L B₁ sin(90°)
- B₁ का मान रखने पर: F = I₂ L × [ (μ₀ I₁) / (2π r) ]
चालक की प्रति एकांक लंबाई पर लगने वाला बल (F/L):
धारा की दिशा समान होने पर आकर्षण बल (Attraction) तथा दिशा विपरीत होने पर प्रतिकर्षण बल (Repulsion) लगता है।
2. 1 एम्पीयर की मानक परिभाषा (Standard Definition of 1 Ampere):
यदि सूत्र में I₁ = I₂ = 1 A, r = 1 m तथा μ₀/2π = 2 × 10⁻⁷ N/A² रखें:
परिभाषा: 1 एम्पीयर वह नियत धारा है जो निर्वात में 1 मीटर की दूरी पर रखे दो अनन्त लम्बाई के सीधे समांतर चालकों में प्रवाहित करने पर उनके बीच प्रति मीटर लम्बाई पर 2 × 10⁻⁷ न्यूटन का आकर्षण या प्रतिकर्षण बल उत्पन्न करती है।
1. फेजर आरेख एवं विभवांतर विश्लेषण:
श्रेणी परिपथ में धारा I समान होती है। प्रेरकत्व का विभवांतर VL धारा से 90° अग्रगामी, धारिता का विभवांतर VC धारा से 90° पश्चगामी तथा प्रतिरोध का विभवांतर VR धारा की कला में होता है।
- परिणामी परिणामी कलातीत विभवांतर = (VL – VC)
- प्रतिरोध विभवांतर = VR
- पाइथागोरस प्रमेय से परिणामी वोल्टता: V² = VR² + (VL – VC)²
- मान रखने पर: V² = (I R)² + (I XL – I XC)² = I² [ R² + (XL – XC)² ]
2. प्रतिबाधा का सूत्र (Impedance, Z):
3. कलान्तर का सूत्र (Phase Angle, ϕ):
1. अपवर्तन का निगमन (Derivation of Refraction):
माना एक समतल तरंगाग्र (Plane Wavefront) AB दो माध्यमों को पृथक करने वाले पृष्ठ ZZ’ पर आपतन कोण i पर आपतित होता है। प्रथम माध्यम में प्रकाश की चाल v₁ तथा द्वितीय माध्यम में v₂ है।
- तरंगाग्र के बिंदु B को पृष्ठ के बिंदु A’ तक पहुँचने में लगा समय t है, अतः BA’ = v₁ t।
- इतने ही समय t में बिंदु A से चलने वाली द्वितीयक तरंगिका द्वितीय माध्यम में दूरी AB’ = v₂ t तय करती है।
- A’B’ अपवर्तित तरंगाग्र (Refracted Wavefront) है तथा अपवर्तन कोण r है।
समकोण त्रिभुज ΔABA’ तथा ΔAA’B’ से:
- sin(i) = BA’ / AA’ = (v₁ t) / AA’
- sin(r) = AB’ / AA’ = (v₂ t) / AA’
भाग देने पर:
यह स्नेल का नियम (Snell’s Law) है। चूँकि आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा आपतन बिंदु पर अभिलंब तीनों एक ही समतल में होते हैं, अतः अपवर्तन के दोनों नियमों की पुष्टि होती है।
व्युत्पत्ति (Derivation):
माना दो संकीर्ण झिरियों S₁ व S₂ के बीच की दूरी d है तथा पर्दे की दूरी D है। पर्दे पर केंद्रीय बिंदु O से x दूरी पर स्थित बिंदु P पर पथांतर S₂P – S₁P = (x d) / D होता है।
1. दीप्त फ्रिंजों की स्थिति (Bright Fringes):
संपोषी व्यतिकरण हेतु पथांतर (x d) / D = m λ ⇒ xm = (m λ D) / d (जहाँ m = 0, 1, 2…)
दो क्रमागत दीप्त फ्रिंजों के बीच की दूरी (फ्रिंज चौड़ाई, β):
2. अदीप्त फ्रिंजों की स्थिति (Dark Fringes):
विनाशी व्यतिकरण हेतु पथांतर (x d) / D = (2m – 1) λ / 2। इससे भी क्रमागत अदीप्त फ्रिंजों के बीच की दूरी β = λ D / d ही प्राप्त होती है।
1. अभिनति प्रकार (Biasing Types):
- अग्र अभिनति (Forward Bias): p-क्षेत्र को बैटरी के धन ध्रुव (+) तथा n-क्षेत्र को ऋण ध्रुव (-) से जोड़ा जाता है। अवक्षय परत (Depletion Layer) की चौड़ाई घटती है और परिपथ में मुख्य धारा (mA) बहती है।
- उत्क्रम अभिनति (Reverse Bias): p-क्षेत्र को ऋण (-) तथा n-क्षेत्र को धन (+) से जोड़ा जाता है। अवक्षय परत की चौड़ाई बढ़ती है और केवल नगण्य सूक्ष्म धारा (µA) बहती है।
2. पूर्ण तरंग दिष्टकारी कार्यविधि (Full Wave Rectifier Working):
इसमें मध्य-निकासी ट्रांसफॉर्मर (Center-Tap Transformer) तथा दो डायोड D₁ व D₂ का उपयोग किया जाता है।
- प्रथम अर्धचक्र (Positive Half Cycle): सिरा A धनात्मक तथा B ऋणात्मक होता है। डायोड D₁ अग्र अभिनत होकर चालन करता है, जबकि D₂ उत्क्रम अभिनत रहता है। लोड RL में धारा X से Y की ओर बहती है।
- द्वितीय अर्धचक्र (Negative Half Cycle): सिरा A ऋणात्मक तथा B धनात्मक होता है। डायोड D₂ अग्र अभिनत होकर चालन करता है तथा D₁ बंद रहता है। लोड RL में धारा पुनः X से Y की ओर ही बहती है।
अतः प्रत्यावर्ती धारा के दोनों अर्धचक्रों में लोड से एक ही दिशा में दिष्ट धारा प्राप्त होती है।
1. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission):
वह प्रक्रिया जिसमें एक भारी नाभिक (जैसे यूरैनियम-235) मंद गति के न्यूट्रॉन को अवशोषित कर लगभग दो बराबर हल्के नाभिकों में टूट जाता है तथा अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होती है।
2. नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion):
वह प्रक्रिया जिसमें दो या दो से अधिक अति हल्के नाभिक (जैसे हाइड्रोजन के समस्थानिक) अत्यधिक उच्च ताप एवं दाब पर परस्पर संयुक्त होकर एक भारी एवं स्थायी नाभिक बनाते हैं।
सूर्य तथा तारों में ऊर्जा का मुख्य स्रोत नाभिकीय संलयन ही है।