UP Board 12th Chemistry Model Paper 2027: UPMSP ने ऑफिशियल यूपी बोर्ड मॉडल पेपर 2027 जारी कर दिया है। यहाँ पर कक्षा 12वीं के रसायन विज्ञान के मॉडल पेपर का हल विस्तार में दिया गया है, जिसे प्रैक्टिस कर अपनी परीक्षा की तैयारी और असरदार बना सकते हैं। सोल्यूशंस का पीडीएफ भी डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध है.
खण्ड ‘अ’ (Section A) – बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
विस्तृत हल (Detailed Solution):
प्रबल वैद्युतअपघट्यों (Strong Electrolytes) के पूर्ण वियोजन (Complete Dissociation) की स्थिति में वांटहॉफ कारक (i) उत्पन्न आयनों की कुल संख्या के बराबर होता है:
- KCl: K+ + Cl– ⟶ कुल 2 आयन (i = 2)
- NaCl: Na+ + Cl– ⟶ कुल 2 आयन (i = 2)
- K2SO4: 2 K+ + SO42- ⟶ कुल 3 आयन (i = 3)
अतः वांटहॉफ कारक के मान क्रमशः 2, 2 तथा 3 होंगे।
(A) उनके गलनांक शुद्ध धातुओं की तुलना में उच्च होते हैं।
(B) वे बहुत कठोर होते हैं।
(C) वे धात्विक कुचालक होते हैं।
(D) वे रासायनिक रूप से बहुत क्रियाशील होते हैं।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
संक्रमण धातुओं के अंतराकाशी स्थलों (Interstitial Sites) में छोटे अधातु परमाणु (H, C, N, B) फँस जाने से अंतराकाशी यौगिक बनते हैं। इनके मुख्य गुण निम्न हैं:
- इनके गलनांक (Melting points) शुद्ध धातुओं की तुलना में अत्यधिक उच्च होते हैं। (कथन A सही)
- ये अत्यधिक कठोर होते हैं (कुछ बोराइड्स हीरे जितने कठोर होते हैं)। (कथन B सही)
- ये अपनी धात्विक चालकता (Metallic Conductivity) सुरक्षित रखते हैं, कुचालक नहीं बनते। (कथन C गलत)
- ये रासायनिक रूप से अक्रिय (Chemically Inert) होते हैं। (कथन D गलत)
अतः केवल कथन A तथा B सत्य हैं।
| कॉलम I | कॉलम II |
|---|---|
| (A) क्लोरोफिल (Chlorophyll) | (a) रोडियम (Rhodium) |
| (B) रक्त वर्णक (Hemoglobin) | (b) कोबाल्ट (Cobalt) |
| (C) विल्किंसन उत्प्रेरक (Wilkinson Catalyst) | (c) आयरन (Iron) |
| (D) विटामिन B12 (Vitamin B12) | (d) मैग्नीशियम (Magnesium) |
विस्तृत हल (Detailed Solution):
जैविक प्रणालियों एवं उद्योगों में महत्वपूर्ण उपसहसंयोजन यौगिकों के केंद्रीय धातु आयन निम्नलिखित हैं:
- (A) क्लोरोफिल ⟶ (d) मैग्नीशियम (Mg2+): पौधों में प्रकाश-संश्लेषण हेतु जिम्मेदार हरा वर्णक है।
- (B) रक्त वर्णक (हीमोग्लोबिन) ⟶ (c) आयरन (Fe2+): रक्त में ऑक्सीजन का परिवहन करने वाला सम्मिश्र है।
- (C) विल्किंसन उत्प्रेरक [(PPh3)3RhCl] ⟶ (a) रोडियम (Rh): एल्कीन के हाइड्रोजनीकरण में प्रयुक्त होता है।
- (D) विटामिन B12 (साइनोकोबालामिन) ⟶ (b) कोबाल्ट (Co3+): एंटी-पर्निशियस एनीमिया कारक है।
तर्क (Reason): एल्डिहाइड और कीटोन दोनों में कार्बोनिल समूह होता है।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
अभिकथन की जाँच: टॉलेन अभिकर्मक [Ammoniacal Silver Nitrate, [Ag(NH3)2]+] एक दुर्बल आक्सीकारक है। यह केवल एल्डिहाइडों को आक्सीकृत करके रजत दर्पण (Silver Mirror) देता है; कीटोन इसका अपचयन नहीं कर पाते। अतः अभिकथन गलत (False) है。
तर्क की जाँच: एल्डिहाइड (R-CHO) एवं कीटोन (R-CO-R) दोनों में ही कार्बोनिल समूह (>C=O) उपस्थित होता है। अतः तर्क सही (True) है।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
गैब्रिएल थैलीमाइड संश्लेषण (Gabriel Phthalimide Synthesis) द्वारा ऐल्किल हैलाइड (R-X) से केवल शुद्ध प्राथमिक ऐमीन (Primary Amine, R-NH2) प्राप्त होती है। इस प्रक्रिया में कार्बन श्रृंखला की लंबाई में कोई परिवर्तन नहीं आता है।
- हॉफमान ब्रोमेमाइड अभिक्रिया में एमाइड से 1 कार्बन कम वाला ऐमीन बनता है।
- NH3 के साथ अमोनियाअपघटन करने पर 1°, 2°, 3° ऐमीन तथा चतुष्क लवण का मिश्रण बनता है।
विस्तृत हल (Detailed Solution):
D-फ्रक्टोज (D-Fructose) की फ्यूरेनोस (5-सदस्यीय वलय) हावर्थ संरचना में:
- एनोमेरी कार्बन C-2 पर -OH समूह नीचे (Down) तथा -CH2OH समूह ऊपर (Up) होता है।
- C-3 पर -OH समूह ऊपर (Up) तथा -H नीचे होता है।
- C-4 पर -OH समूह नीचे (Down) तथा -H ऊपर होता है।
- C-5 पर -CH2OH समूह ऊपर (Up) तथा -H नीचे होता है।
अतः यह विशिष्ट विन्यास संरचना (iii) द्वारा प्रदर्शित होता है।
खण्ड ‘ब’ एवं खण्ड ‘स’ (Section B & Section C) – अति लघु एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
दिया है (Given):
- विलेय (CH3COOH) का द्रव्यमान (w) = 2.5 g
- विलायक (बेंजीन) का द्रव्यमान (W) = 75 g = 75 / 1000 = 0.075 kg
- CH3COOH का मोलर द्रव्यमान (M) = 12 + (3 × 1) + 12 + 16 + 16 + 1 = 60 g/mol
गणना (Calculation):
- CH3COOH के मोल = 2.5 / 60 = 0.04167 mol
- मोललता (m) = 0.04167 / 0.075 kg = 0.556 mol/kg (या 0.556 m)
अतः एथेनोइक अम्ल के विलयन की मोललता 0.556 m होगी।
1. मिश्रधातु की परिभाषा (Definition):
दो या दो से अधिक धातुओं अथवा धातु एवं अधातु के समांगी मिश्रण (Homogeneous mixture) को मिश्रधातु (Alloy) कहते हैं।
2. संक्रमण धातुओं की मिश्रधातुओं के दो मुख्य गुण:
- उच्च कठोरता एवं गलनांक (High Hardness & Melting Point): संक्रमण धातुओं के आकार लगभग समान होने के कारण एक धातु दूसरी धातु के क्रिस्टल जालक में आसानी से फिट हो जाती है, जिससे बनी मिश्रधातुएँ अत्यधिक कठोर व उच्च गलनांक वाली होती हैं (उदा. पीतल, कांस्य, स्टेनलेस स्टील)।
- संक्षारण प्रतिरोधकता (Corrosion Resistance): मिश्रधातुएँ वायु, जल एवं अम्लों के प्रति अत्यधिक स्थायी होती हैं और इनमें आसानी से जंग नहीं लगता।
(a) डाइक्लोरोबिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) प्लैटिनम (IV) नाइट्रेट
(b) टेट्राऐम्मीनएक्वाक्लोरिडोकॉबाल्ट (III) क्लोराइड
(a) डाइक्लोरोबिस (एथेन-1, 2-डाइऐमीन) प्लैटिनम (IV) नाइट्रेट:
- केंद्रीय धातु = Pt4+, लिगैंड = 2 Cl–, 2 en (neutral), ऋणायन = NO3–
- सुलभ संकुल आयन = [Pt(en)2Cl2]2+
(b) टेट्राऐम्मीनएक्वाक्लोरिडोकॉबाल्ट (III) क्लोराइड:
- केंद्रीय धातु = Co3+, लिगैंड = 4 NH3, 1 H2O, 1 Cl–, ऋणायन = Cl–
- सुलभ संकुल आयन = [Co(NH3)4(H2O)Cl]2+
परिभाषा (Definition):
वे नाभिकरागी (Nucleophiles) जिनमें दो भिन्न परमाणु इलेक्ट्रॉन युग्म प्रदान (दाता परमाणु) कर सकते हैं, परंतु एक समय में केवल एक ही परमाणु उपसहसंयोजक बंध बनाता है, उभयदंती नाभिकरागी कहलाते हैं।
उदाहरण (Example): सायनाइड आयन (CN–)
सायनाइड आयन में C तथा N दोनों ही दाता परमाणु की भाँति कार्य कर सकते हैं:
- जब कार्बन (C) परमाणु आक्रमण करता है, तो ऐल्किल सायनाइड (R-CN) बनता है।
- जब नाइट्रोजन (N) परमाणु आक्रमण करता है, तो ऐल्किल आइसोसायनाइड (R-NC) बनता है।
R-X + AgCN ⟶ R-NC + AgX (मुख्य उत्पाद: आइसोसायनाइड)
दिया है (Given):
- विलेय (प्रोटीन) का भार (w2) = 1.26 g
- विलयन का आयतन (V) = 200 cm3 = 0.200 L
- ताप (T) = 300 K
- परासरण दाब (π) = 2.57 × 10-3 bar
- गैस नियतांक (R) = 0.083 L bar mol-1 K-1
गणना (Calculation):
M2 = (1.26 × 0.083 × 300) / (2.57 × 10-3 × 0.200)
M2 = 31.374 / (0.000514) = 61038.9 g/mol (या ≈ 61039 g/mol)
अतः प्रोटीन का मोलर द्रव्यमान 61,039 g/mol है।
व्याख्या एवं अभिक्रिया चरण (Process Steps):
क्यूमीन (आइसोप्रोपिलबेंजीन) को वायु की उपस्थिति में ऑक्सीकृत करने पर क्यूमीन हाइड्रोपरऑक्साइड बनता है, जो तनु अम्ल के साथ जलअपघटित होकर फीनॉल तथा एसीटोन देता है।
C6H5-C(CH3)2-O-O-H ⎯⎯⎯(H+ / H2O)⎯⎯⎯> C6H5OH (फीनॉल) + CH3COCH3 (एसीटोन)
इस औद्योगिक विधि का मुख्य लाभ यह है कि इसमें उप-उत्पाद के रूप में मूल्यवान एसीटोन (Acetone) प्राप्त होता है।
1. एल्डिहाइडों के उपयोग (Uses of Aldehydes):
- फॉर्मेलीन (Formalin): 40% फॉर्मेल्डिहाइड जलीय विलयन का उपयोग जीवविज्ञान प्रयोगशालाओं में जैविक नमूनों (Biological specimens) के परिरक्षण में होता है।
- बैकेलाइट प्लास्टिक: फॉर्मेल्डिहाइड का उपयोग फीनॉल-फॉर्मेल्डिहाइड रेजिन (बैकेलाइट) बहुलक बनाने में होता है।
2. कीटोनों के उपयोग (Uses of Ketones):
- औद्योगिक विलायक: प्रोपेनोन (एसीटोन) का उपयोग नेल पॉलिश रिमूवर, रबर, वार्निश तथा गोंद के उत्कृष्ट विलायक के रूप में होता है।
- औषधि निर्माण: एसीटोन का उपयोग क्लोरोफॉर्म, आयोडोफॉर्म तथा सम्मोहक औषधियों के निर्माण में होता है।
उत्तर:
D.N.A. में कुल 4 प्रकार के विषमचक्रीय नाइट्रोजन युक्त क्षारक पाए जाते हैं, जिन्हें दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है:
- 1. प्यूरिन क्षारक (Purine Bases – द्विवलयीय):
- (i) एडिनिन (Adenine – A)
- (ii) ग्वानिन (Guanine – G)
- 2. पिरिमिडिन क्षारक (Pyrimidine Bases – एकवलयीय):
- (i) साइटोसिन (Cytosine – C)
- (ii) थाइमिन (Thymine – T)
खण्ड ‘द’ – लघु उत्तरीय प्रश्न (3-अंक एवं 4-अंक)
(i) आदर्श तथा अनादर्श विलयन में अंतर (Ideal vs Non-Ideal Solutions):
| गुण धर्म | आदर्श विलयन (Ideal Solution) | अनादर्श विलयन (Non-Ideal Solution) |
|---|---|---|
| राऊल्ट का नियम | सभी सांद्रताओं पर राऊल्ट के नियम का पालन करते हैं (P = PA + PB)। | राऊल्ट के नियम से धनात्मक या ऋणात्मक विचलन प्रदर्शित करते हैं। |
| एंथैल्पी परिवर्तन (ΔHmix) | ΔHmix = 0 (न ऊष्मा निकलती है, न अवशोषित होती है)। | ΔHmix ≠ 0 (ऊष्माक्षेपी या ऊष्माशोषी)। |
| आयतन परिवर्तन (ΔVmix) | ΔVmix = 0 (मिश्रण का आयतन घटकों के योग के बराबर रहता है)। | ΔVmix ≠ 0 (आयतन बढ़ता या घटता है)। |
(ii) अतिपरासरी तथा अल्पपरासरी विलयन में अंतर (Hypertonic vs Hypotonic Solutions):
- अतिपरासरी विलयन (Hypertonic Solution): जिस विलयन का परासरण दाब (Osmotic Pressure) दूसरे विलयन की तुलना में अधिक होता है। इसमें कोशिका (Cell) रखने पर वह जल बाहर निकलने के कारण सिकुड़ (Plasmolysis) जाती है।
- अल्पपरासरी विलयन (Hypotonic Solution): जिस विलयन का परासरण दाब दूसरे विलयन की तुलना में कम होता है। इसमें कोशिका रखने पर जल अंदर प्रवेश करता है जिससे कोशिका फूल जाती है।
1. परिभाषा (Definition):
वे गैल्वेनिक सेल (Galvanic Cells) जो ईंधन (जैसे H2, CO, CH4) के दहन (Combustion) की रासायनिक ऊर्जा को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं, ईंधन सेल (Fuel Cell) कहलाते हैं। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण H2-O2 ईंधन सेल है।
2. उत्प्रेरक (Catalyst Used):
इलेक्ट्रोड के रूप में सरंध्र कार्बन छड़ों का प्रयोग किया जाता है, जिनमें सूक्ष्म विभाजित प्लैटिनम (Pt) या पैलेडियम (Pd) उत्प्रेरक के रूप में मिलाया जाता है। इसमें जलीय KOH का उपयोग विद्युत अपघट्य के रूप में होता है।
3. इलेक्ट्रोड अभिक्रियाएँ (Electrode Reactions):
कैथोड पर (Cathodic): O2 (g) + 2 H2O (l) + 4 e– ⟶ 4 OH– (aq)
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯
कुल अभिक्रिया (Overall Reaction): 2 H2 (g) + O2 (g) ⟶ 2 H2O (l)
1. ताप गुणांक (Temperature Coefficient):
सामान्यतः किसी रासायनिक अभिक्रिया का ताप 10°C (या 10 K) बढ़ाने पर उसका वेग स्थिरांक (Rate Constant, k) लगभग 2 से 3 गुना (Double to Triple) हो जाता है। इसे ताप गुणांक कहते हैं:
2. आरहेनियस समीकरण (Arrhenius Equation):
अभिक्रिया वेग की ताप पर सटीक निर्भरता को स्वीडिश रसायनशास्त्री आरहेनियस ने निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त किया:
जहाँ A = आवृत्ति कारक (Frequency factor), Ea = सक्रिएण ऊर्जा (Activation Energy), R = गैस नियतांक, तथा T = परम ताप (Absolute Temperature)।
- ताप T बढ़ाने पर पद e(-Ea / RT) का मान बढ़ता है, जिससे प्रभावी टक्करों (Effective Collisions) की संख्या बढ़ती है।
- दो भिन्न तापों T₁ तथा T₂ पर वेग स्थिरांकों k₁ एवं k₂ का संबंध:
(i) Cu+ आयन का जलीय विलयन में अस्थायी होना (Instability of Cu+ in Aqueous Solution):
जलीय विलयन में Cu+ आयन असमानुपातन (Disproportionation) प्रदर्शित करता है और Cu2+ तथा कॉपर धातु में परिवर्तित हो जाता है:
कारण: यद्यपि Cu+ से द्वितीय आयनन एंथैल्पी (Second Ionization Enthalpy) द्वारा Cu2+ बनाने में ऊर्जा लगती है, परंतु Cu2+ आयन की जल-योजन एंथैल्पी (Hydration Enthalpy, ΔhydH) का अत्यधिक ऋणात्मक मान इस ऊर्जा की क्षतिपूर्ति से भी अधिक ऊर्जा मुक्त करता है।
(ii) Cu2+ तथा Fe2+ में प्रबल अपचायक (Fe2+ as Stronger Reducing Agent):
Fe2+ एक प्रबल अपचायक है (Fe2+ ⟶ Fe3+ + e–)।
कारण: Fe2+ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास [Ar] 3d6 है। एक इलेक्ट्रॉन त्यागने के बाद Fe3+ का विन्यास [Ar] 3d5 बन जाता है, जो कि एक अर्द्धभरित (Half-filled) d-कक्षक होने के कारण अत्यधिक स्थायी (Extremely stable) होता है। इसके विपरीत Cu2+ (3d9) इलेक्ट्रॉन आसानी से त्यागकर 3d8 नहीं बनाना चाहता।
क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन का सिद्धांत (Crystal Field Splitting in Tetrahedral Field):
चतुष्फलकीय संकुलों में 4 लिगैंड केंद्रीय धातु आयन के अक्षों के मध्य (In-between the axes) से पहुँचते हैं।
- अक्षों के बीच स्थित d-कक्षक (dxy, dyz, dzx) लिगैंडों के अधिक निकट होते हैं, अतः ये अधिक प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं और इनकी ऊर्जा बढ़ जाती है। इन्हें t2 कक्षक समूह कहते हैं।
- अक्षों पर स्थित d-कक्षक (dx²-y², dz²) लिगैंडों से दूर होते हैं, अतः इनकी ऊर्जा कम हो जाती है। इन्हें e कक्षक समूह कहते हैं।
चूँकि चतुष्फलकीय विपाटन ऊर्जा (Δt) का मान अष्टफलकीय विपाटन ऊर्जा (Δo) का केवल 4/9 भाग होता है, इसलिए यह मान युग्मन ऊर्जा (P) से सदैव कम होता है। अतः चतुष्फलकीय संकुल सदैव उच्च चक्रण संकुल (High Spin Complexes) ही बनाते हैं।
दिया है (Given):
- सांद्रता (C) = 0.00241 M = 2.41 × 10-3 mol/L
- विशिष्ट चालकता (κ) = 7.896 × 10-5 S cm-1
- सीमांत मोलर चालकता (Λm0) = 390.5 S cm2 mol-1
1. मोलर चालकता की गणना (Molar Conductivity, Λm):
2. वियोजन की मात्रा (Degree of Dissociation, α):
3. वियोजन स्थिरांक की गणना (Dissociation Constant, Ka):
Ka = [ 0.00241 × 0.00704 ] / 0.9161 = (1.696 × 10-5) / 0.9161 = 1.85 × 10-5 mol/L
अतः एसिटिक अम्ल का वियोजन स्थिरांक 1.85 × 10-5 mol/L है।
उत्तर: आणविक आकृति के आधार पर प्रोटीनों को दो प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है:
1. रेषेदार प्रोटीन (Fibrous Proteins):
- जब पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ एक-दूसरे के समांतर (Parallel) चलती हैं तथा हाइड्रोजन एवं डाइसल्फाइड बंधों द्वारा जुड़ी रहती हैं, तो रेषे जैसी संरचना बनती है।
- ये सामान्यतः जल में अविलेय (Insoluble in water) होते हैं।
- उदाहरण: केरेटिन (Keratin – बाल, ऊन, त्वचा में) तथा मायोसिन (Myosin – मांसपेशियों में)।
2. गोलिकाकार प्रोटीन (Globular Proteins):
- जब पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ मुड़कर/लपेटकर एक गोलिका (Spherical) जैसी आकृति धारण कर लेती हैं।
- ये सामान्यतः जल में विलेय (Soluble in water) होते हैं।
- उदाहरण: इंसुलिन (Insulin) तथा ऐल्बूमिन (Albumin – अंडे में)।
(i) शून्य कोटि अभिक्रिया (Zero Order Reaction – [R] vs t):
समीकरण [R] = -k t + [R]₀ के अनुसार, सांद्रता [R] तथा समय t के बीच आलेख एक ऋणात्मक ढाल (-k) वाली सीधी रेखा (Straight line) होता है जिसका अंतःखंड [R]₀ है।
(ii) प्रथम कोटि अभिक्रिया (First Order Reaction – log([R]₀/[R]) vs t):
समीकरण log([R]₀/[R]) = (k / 2.303) × t के अनुसार, यह मूल बिंदु से होकर जाने वाली सीधी रेखा है जिसकी ढाल k / 2.303 होती है।
(iii) आरहेनियस समीकरण (Arrhenius Plot – ln k vs 1/T):
समीकरण ln k = ln A – (Ea / R) × (1/T) के अनुसार, ln k तथा 1/T के मध्य आलेख एक सीधी रेखा है जिसकी ढाल -Ea / R तथा अंतःखंड ln A होता है।
(iv) प्रथम कोटि अभिक्रिया (ln [R] vs t):
समीकरण ln [R] = -k t + ln [R]₀ के अनुसार, ln [R] तथा t के मध्य ग्राफ ऋणात्मक ढाल (-k) वाली सीधी रेखा होता है।
खण्ड ‘य’ (Section E) – दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5-अंक)
(i) एथिलऐमीन का जल में विलेय होना तथा एनीलीन का अविलेय होना:
एथिलऐमीन (C2H5NH2) जल के अणुओं के साथ अंतर-आणविक हाइड्रोजन बंध (Hydrogen Bonding) आसानी से बना लेती है। इसके विपरीत, एनीलीन (C6H5NH2) में एक बड़ा हाइड्रोफोबिक (जल-विरोधी) ऐरिल/बेंजीन समूह (C6H5-) उपस्थित होता है, जो H-बंध बनने में बाधा उत्पन्न करता है। अतः एनीलीन जल में लगभग अविलेय है।
(ii) ऐरोमैटिक डाइऐज़ोनियम लवणों का उच्च स्थायित्व:
ऐरोमैटिक डाइऐज़ोनियम आयन (C6H5-N2+) में बेंजीन वलय के π-इलेक्ट्रॉनों का डाइऐज़ोनियम समूह के साथ अनुनाद (Resonance) होता है। यह अनुनादी संरचना आयन को स्थायित्व प्रदान करती है, जबकि ऐलिफैटिक डाइऐज़ोनियम लवणों में अनुनाद न होने के कारण वे तुरंत N2 गैस निकालकर ऐल्कोहॉल में अपघटित हो जाते हैं।
(iii) एनीलीन का फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया न दर्शाना:
एनीलीन एक प्रबल लुईस क्षार है। फ्रीडेल-क्राफ्ट्स अभिक्रिया में प्रयुक्त उत्प्रेरक ऐलुमिनियम क्लोराइड (AlCl3) एक प्रबल लुईस अम्ल है। एनीलीन AlCl3 के साथ अभिक्रिया करके तुरंत एक संकुल लवण (Adduct/Salt) बना लेती है:
इस संकुल के बनने से N-परमाणु पर धनावेश आ जाता है, जिससे बेंजीन वलय अत्यधिक निष्क्रिय (Deactivated) हो जाती है और अभिक्रिया आगे नहीं बढ़ती।
(i) एथेनोइक अम्ल से मेथेनेमीन:
(ii) नाइट्रोमेथेन से डाइमेथिलऐमीन:
(iii) मेथेनेमीन से एथेनेमीन:
(iv) हेक्सेननाइट्राइल से 1-ऐमिनोपेंटेन:
(v) एथेनेमीन से मेथेनेमीन:
(i) प्रोपीन से प्रोपेन-2-ऑल (अम्ल-प्रेरित जल-योजन – मार्कोनीकॉफ नियम):
(ii) बेन्जिल क्लोराइड से बेन्जिल ऐल्कोहॉल (नाभिकरागी प्रतिस्थापन):
(iii) एथिल मैग्नीशियम क्लोराइड से प्रोपेन-1-ऑल (ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक + फॉर्मेल्डिहाइड):
(iv) एनिसोल से p-ब्रोमोएनिसोल (इलेक्ट्रॉनरागी ऐरोमैटिक ब्रोमीनीकरण):
(v) फीनॉल से बेन्जीन (जिंक रज के साथ अपचयन):
(i) कोल्बे अभिक्रिया (Kolbe’s Reaction):
सोडियम फीनॉक्साइड को CO2 के साथ 400 K ताप एवं 4-7 atm दाब पर गर्म करने के बाद अम्ल द्वारा जलअपघटित करने पर 2-हाइड्रॉक्सीबेन्जोइक अम्ल (सेलिसिलिक अम्ल) प्राप्त होता है।
(ii) राइमर-टीमन अभिक्रिया (Reimer-Tiemann Reaction):
फीनॉल की अभिक्रिया क्लोरोफॉर्म (CHCl3) तथा जलीय NaOH/KOH के साथ 340 K पर कराने के पश्चात् अम्लीकरण करने पर ऑर्थो-फॉर्मिल फीनॉल (सेलिसिलैल्डिहाइड) मुख्य उत्पाद के रूप में बनता है।
(iii) विलियम्सन ईथर संश्लेषण (Williamson Ether Synthesis):
ऐल्किल हैलाइड की अभिक्रिया सोडियम ऐल्कोक्साइड या सोडियम फीनॉक्साइड के साथ कराने पर SN2 क्रियाविधि द्वारा ईथर बनता है।
उदाहरण: CH3I + C2H5ONa ⟶ C2H5-O-CH3 (मेथॉक्सीएथेन) + NaI
(i) उच्च क्वथनांक का कारण:
कार्बोक्सिलिक अम्ल के अणुओं में दो अंतर-आणविक हाइड्रोजन बंध बनने के कारण ये वाष्प अवस्था तथा अध्रुवीय विलायकों में भी द्वितय (Dimer) संरचना में रहते हैं। यह मजबूत H-बंध एल्डिहाइड एवं कीटोन में अनुपस्थित होता है।
(ii) धातुओं से अभिक्रिया:
कार्बोक्सिलिक अम्ल विद्युतधनी धातुओं (Na, K, Mg) के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस (H2 Gas) मुक्त करते हैं।
(iii) ऐल्कोहॉलों की तुलना में प्रबल अम्लीयता:
प्रोटॉन (H+) त्यागने के पश्चात् बना कार्बोक्सिलेट आयन (R-COO–) दो समतुल्य अनुनादी संरचनाओं द्वारा अत्यधिक स्थायी होता है। इसके विपरीत, ऐल्कोहॉल से बना ऐल्कोक्साइड आयन (R-O–) अनुनाद द्वारा स्थायी नहीं हो पाता।
(iv) सोडा लाइम द्वारा विबोक्सिलीकरण (Decarboxylation):
(v) α-हाइड्रोजन युक्त अभिक्रिया का नाम:
(i) यौगिक A, B, C की पहचान:
- यौगिक B: फेहलिंग परीक्षण देता है ⟶ एल्डिहाइड है। आयोडोफॉर्म परीक्षण देता है ⟶ CH3CHO (एथेनैल) है।
- यौगिक C: फेहलिंग नहीं देता, पर आयोडोफॉर्म देता है ⟶ CH3COCH3 (प्रोपेनोन / एसीटोन) है।
- यौगिक A (एल्कीन): CH3CHO + O=C(CH3)2 से निर्मित एल्कीन = CH3-CH=C(CH3)2 (2-मेथिलब्यूट-2-ईन, C5H10)।
B = एथेनैल [CH3CHO]
C = प्रोपेनोन [CH3COCH3]
(ii) A से D तक पहचान:
CH3COCl + H2 ⎯⎯(Pd-BaSO4)⎯⎯> CH3CHO [B = एथेनैल / एसेटैल्डिहाइड]
CH3CHO + CH3MgBr ⎯⎯(H3O+)⎯⎯> CH3-CH(OH)-CH3 [C = प्रोपेन-2-ऑल]
CH3CHO + LiAlH4 ⟶ CH3CH2OH [D = एथेनॉल]
(i) n-ब्यूटिल क्लोराइड + ऐल्कोहॉलीय KOH (विहाइड्रोहैलोजनीकरण – E2):
(ii) ब्रोमोबेन्जीन + Mg (ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का निर्माण):
(iii) एथिल क्लोराइड + जलीय KOH (नाभिकरागी प्रतिस्थापन):
(iv) मेथिल क्लोराइड + KCN (सायनाइड निर्माण):
(v) मेथिल ब्रोमाइड + सोडियम (वुर्ट्ज़ अभिक्रिया):
(i) फ़िंकेलस्टाइन अभिक्रिया (Finkelstein Reaction):
(ii) सायनाइड प्रतिस्थापन:
(iii) डार्जन अभिक्रिया (Darzen Process):
(iv) खराश प्रभाव / एन्टी-मार्कोनीकॉफ नियम (Peroxide Effect):
(v) मार्कोनीकॉफ नियम (Markownikoff’s Addition):